नेशन की कल्पना Exclusiveness, भारतीय राष्ट्र की कल्पना Inclusiveness पर आधारित
दिनांक: 12-Aug-2016


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि भारत के शिक्षक का दायित्व बनता है कि भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि से विद्यार्थियों को परिचित करवायें. भारतीयों में अपार प्रतिभा है, जिसका लोहा सारा विश्व मानता है. पाश्चात्य जगत के शिक्षक और भारतीय शिक्षक में ये ही अंतर है कि पाश्चात्य जगत में शिक्षक का विद्यार्थी से व्यावसायिक सम्बन्ध है, भारी शुल्क लेकर शिक्षक ज्ञान प्रदान करता है. परंतु भारत में शिक्षक विद्यार्थी सम्बन्ध गुणात्मक है, जिसमें मनुष्य तत्व गुण जगाने हेतु शिक्षक विद्यार्थियों को विश्व ज्ञान के साथ साथ संस्कार एवं आध्यात्मिक क्षमता तथा राष्ट्रीय दायित्व बोध प्रदान करता है ताकि विद्यार्थी का सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास हो. आज शिक्षक को इसी दिशा में अपना ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है.

भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से यह पता चलता है कि पूरे भारत वर्ष में लगभग 31.5  करोड़ विद्यार्थी हैं. युवा देश की इस धरोहर के निर्माण में संलग्न प्राध्यापक सही मायनों में देश के भविष्य के निर्माता हैं. इसी लक्ष्य को लेकर मालवा प्रान्त में लगातार दूसरे वर्ष एक तीन दिवसीय प्रांतीय प्राध्यापक नैपुण्य वर्ग दिनांक 5,6,7 अगस्त को इंदौर में संपन्न हुआ. वर्ग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ.


सह सरकार्यवाह जी ने भारत जीवन दर्शन और राष्ट्र की परिकल्पना पर विचार रखते हुए कहा कि भारत एक सनातन राष्ट्र है, इसको बनाना नहीं समझना है. नेशन और राष्ट्र दोनों अलग अलग शब्द हैं अर्थात दोनों के निहितार्थ अलग अलग है. वर्ष 1789 में फ़्रांस क्रांति हुई, उसके बाद नेशनलिज्म शब्द अस्तित्व में आया. अन्यान्य देशों में इसकी अलग अलग परिभाषा है, विश्व में कई नेशन (देश) भाषा, जाति, संप्रदाय, आर्थिक आधार पर निर्मित हुए. इसी नेशन शब्द को भारत के राष्ट्र की कल्पना से जोड़ दिया गया, जबकि भारत के राष्ट्र की कल्पना बहुत अलग है. भारत में कई आक्रमणकारी आए, परंतु वे भारत की संस्कृति में विलीन हो गए. पाश्चात्य नेशन की कल्पना Exclusiveness पर आधारित है, जबकि भारतीय राष्ट्र की कल्पना Inclusiveness पर आधारित है. भारत के राजा, सेना, सेनापति तो हारे पर राष्ट्र दर्शन सदैव विजयी रहा क्योंकि हमारे राष्ट्र का आधार राजा नहीं था, संस्कृति में आध्यात्मिकता थी, सर्वसमन्वयता का गुण भारत का दर्शन है जो विश्व में अद्वितीय है, इस्लाम के आक्रमण के समय भी विभिन्न धर्मगुरु जैसे कबीर, नानकदेव, रैदास, तुलसीदास, समर्थ रामदास आदि द्वारा हिन्दुत्व का प्रचार प्रसार चलता रहा अर्थात राष्ट्र जीवित रहा. अंग्रेजों के शासनकाल में भी महर्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानंद, तिलक, बंकिमचंद चटोपाध्याय आदि के माध्यम से आध्यात्मिकता जीवित रही. यह धरती हमारी माँ है, यह दर्शन भी हमारे ऋषियों ने दिया “माता भूमि पुत्रोहम पृथिव्या” हमारे दर्शन में पृथ्वी का प्रत्येक अवयय पूजनीय है ( नदी, पर्वत, सरोवर, वृक्ष आदि) और इन सबके पीछे भारत राष्ट्र का आधार हिन्दू है.

प्रांतीय प्राध्यापक नैपुण्य वर्ग में कुल 7 विभागों से प्रतिनिधित्व रहा, जिसमें 76 महाविद्यालयों से कुल 17 प्राचार्य/डायरेक्टर, 16 रिसर्च स्कॉलर तथा कुल 188 प्राध्यापक उपस्तिथ थे. इस तीन दिवसीय नैपुण्य वर्ग में राष्ट्र का गौरव, शिक्षक की भूमिका, भारतीय जीवन दर्शन आदि विषयों पर सत्र हुए एवं जिज्ञासा समाधान भी किया गया. तीन दिवसीय वर्ग में मुख्य रूप से  क्षेत्रीय संघ चालक अशोक जी सोहनी, प्रान्त संघचालक डॉ. प्रकाश जी शास्त्री, प्रान्त प्रचारक पराग जी अभ्यंकर, सह प्रान्त प्रचारक डॉ. श्रीकांत जी, सह प्रान्त कार्यवाह विनीत नवाथे उपस्तिथ थे.