हिन्दुत्व की विचारधारा किसी के विरोध में नहीं है
दिनांक: 01-Sep-2016


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि हिन्दुत्व की विचारधारा किसी के विरोध में नहीं है. किसी का द्वेष और विरोध हिन्दुत्व नहीं है, बल्कि सबके प्रति प्रेम, सबके प्रति विश्वास और आत्मीयता यही हिन्दुत्व है. हम देश के लिए काम करते हैं. हिन्दुत्व कोई कर्मकांड भी नहीं है. यह अध्यात्म व सत्य पर आधारित दर्शन है. उन्होंने कहा कि भारत की एकता अखण्डता को अक्षुण्ण रखते हुए भारत को परम वैभव पर पहुँचाने के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कुछ नहीं करना है. हम दुनिया में भारत माता की जय-जयकार कराने के लिए काम कर रहे हैं. लेकिन भारत माता की पूजा में विचारों की अपवित्रता नहीं आनी चाहिए. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी रविवार 28 अगस्त को निरालानगर स्थित सरस्वती कुंज माधव सभागार में लखनऊ विभाग के कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे.

सरसंघचालक जी ने कहा कि केवल दुर्बल रहना भी हिन्दुत्व नहीं है. हिन्दुओं को सामर्थ्य सम्पन्न बनना चाहिए. सबको अपनापन, सबको ऊपर उठाना, लेकिन कट्टरता नहीं, ऐसा समाज चाहिए. उन्होंने कहा कि ‘‘समाज हमारा भगवान है. हम समाज की सेवा करने वाले लोग हैं. मुझे इसके बदले में क्या मिलेगा, इसके बारे में सोचना भी नहीं. हम हिन्दू राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए कार्य करेंगे. हम यह काम कर रहे हैं, यह अभिमान भी हममें नहीं आना चाहिए.’’ डॉ. भागवत जी ने कहा कि हमें प्रतिक्रिया में कोई काम नहीं करना है. धर्म स्थापना के लिए ही महाभारत का युद्ध हुआ. भगवान बुद्ध ने सम्पूर्ण करुणा और अहिंसा का उपदेश दिया. भगवान राम और भगवान कृष्ण ने भी सब धर्म के लिए किया. इसलिए प्रत्येक कार्यकर्ता को सकारात्मक सोच के आधार पर कार्य करना पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि हमारे लिए भारत एक गुणवाचक शब्द है. अध्यात्म के आधार पर विचार करते हुए हमारे पूर्वजों ने जिस विचारधारा के आधार पर भारत को बनाने का काम किया है, वही हिन्दुत्व है. संघ हिन्दू समाज का संगठन करने के अलावा कुछ नहीं करेगा, लेकिन संघ के स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेंगे. हिन्दू धर्म संस्कृति व समाज के लिए जो कुछ भी उपयोगी होगा, वह सब संघ के स्वयंसेवक करेंगे. संघ के कार्यकर्ता अपने को संघ विचार के अनुरूप ढालने का प्रयास करें. हम संघ के स्वयंसेवक हैं. संघ हिन्दू समाज का संगठन है.

सरसंघचालक जी ने कहा कि जो परिवर्तन समाज में आना चाहिए, उसके लिए पहले स्वयंसेवकों को अपने जीवन अर्थात् कृतित्व में उतारना होगा. उन्होंने सभी स्वयंसेवकों से कहा कि अपनी आजीविका में भी पहले समाज को सर्वोपरि रखकर उनकी आत्मीयता के आधार पर सेवा करें. संघ जैसा प्रत्येक कार्यकर्ता को बनना पड़ेगा, तभी संघ का काम बढ़ेगा.